राम वन गमन मार्ग धंसा, ₹4,400 करोड़ की परियोजना पर उठे सवाल

राम वन गमन मार्ग धंसा ₹4,400 करोड़ की परियोजना पर सवाल

उत्तर प्रदेश: धार्मिक पर्यटन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया जा रहा राम वन गमन मार्ग (NH-731A) आधिकारिक लोकार्पण से पहले ही सड़क धंसने और तटबंधों के बैठने की घटनाओं को लेकर सवालों के घेरे में आ गया है। करीब ₹4,400 करोड़ से ₹4,550 करोड़ की अनुमानित लागत वाली यह परियोजना लगभग 210 किलोमीटर लंबी है और अयोध्या से चित्रकूट तक भगवान श्रीराम की पौराणिक वनगमन यात्रा से जुड़े प्रमुख स्थानों को जोड़ने के उद्देश्य से विकसित की जा रही है।

इस परियोजना का शिलान्यास वर्ष 2022 में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार के नेतृत्व में वर्चुअल माध्यम से किया गया था। परियोजना के प्रमुख हिस्सों के लोकार्पण की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंचीं, तभी प्रयागराज के ऐतिहासिक शृंगवेरपुर धाम और चित्रकूट के आसपास सड़क धंसने की घटनाएं सामने आ गईं। इससे निर्माण की गुणवत्ता, भू-तकनीकी जांच, जल निकासी और ठेकेदारों की जिम्मेदारी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।

शृंगवेरपुर धाम में सड़क धंसने से यातायात बंद

प्रयागराज के शृंगवेरपुर धाम वाले हिस्से में सबसे गंभीर स्थिति सामने आई। लखनऊ-प्रयागराज मुख्य मार्ग से शृंगवेरपुर गंगा पुल के बीच करीब 100 मीटर के दायरे में चार अलग-अलग जगहों पर कैरिजवे की सतह धंस गई। सड़क की डामर परतों में चौड़ी दरारें भी दिखाई दीं। भारी बारिश के दौरान तटबंध की नींव में पानी पहुंचने के बाद सड़क का मध्य हिस्सा नीचे बैठने की बात सामने आई।

यह हिस्सा गंगा नदी पर बने करीब 1,200 मीटर लंबे छह-लेन पुल के पहुंच मार्ग से जुड़ा है। सड़क को सहारा देने के लिए बनाई गई Reinforced Earth Wall (RE Wall) के कंक्रीट फेशिया पैनल और बीम भी बाहर की ओर झुक गए। स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने इस पूरे कॉरिडोर पर भारी और हल्के वाहनों की आवाजाही रोक दी। इससे प्रयागराज-कौशांबी-चित्रकूट के बीच सीधा संपर्क अस्थायी रूप से प्रभावित हुआ।

चित्रकूट में दो महीने पुरानी सड़क में दरार

दूसरी बड़ी समस्या चित्रकूट जिले में राजापुर-कर्वी मार्ग पर रम्मपुरिया गांव के पास सामने आई। यहां सड़क का निर्माण पूरा हुए करीब दो महीने ही हुए थे, लेकिन लगभग 50 मीटर के हिस्से में सड़क की सतह पर चौड़ी दरारें दिखाई देने लगीं। कई स्थानों पर सबग्रेड भी धंस गया।

इस क्षेत्र में यमुना नदी पर प्रस्तावित नया पुल अभी पूरा नहीं हुआ है। इसके कारण वैकल्पिक रास्तों से गुजरने वाले भारी वाणिज्यिक और ओवरलोडेड वाहनों का लगातार दबाव इस नवनिर्मित सड़क पर पड़ रहा था। इसके साथ बारिश के पानी के रिसाव ने स्थिति को और खराब कर दिया।

राम वन गमन मार्ग को पांच पैकेज में बांटा गया

अयोध्या से सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, प्रयागराज, कौशांबी और चित्रकूट को जोड़ने वाले करीब 210 किलोमीटर लंबे इस कॉरिडोर को निर्माण और प्रशासनिक काम आसान बनाने के लिए पांच प्रमुख पैकेज में बांटा गया है। इन पैकेजों में EPC और Hybrid Annuity Model (HAM) दोनों तरह के निर्माण मॉडल का इस्तेमाल किया गया है।

पैकेजखंडलंबाईमॉडलनिर्माण एजेंसीवर्तमान स्थिति
पैकेज-1मोहनगंज से जेठवारा और औतारपुर35.000 किमीEPCमेसर्स आरजी बिल्डवेल इंजीनियर लि.टू-लेन विद paved shoulder, सिविल कार्य पूरा
पैकेज-2औतारपुर से सिंगरौर उपरहार14.155 किमीHAMमेसर्स एसएंडपी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर प्रा. लि.फोर-लेन चौड़ीकरण, यातायात परिचालन में
पैकेज-3सिंगरौर उपरहार से बरनपुर कादीपुर इचौली25.545 किमीHAMमेसर्स पीएनसी इंफ्राटेक लि. (PNC Infratech)शृंगवेरपुर गंगा पुल सहित हिस्सा, धंसाव और दरारों से प्रभावित
पैकेज-4बरनपुर कादीपुर इचौली से रामपुरिया अव्वल38.250 किमीHAMमेसर्स जीआर इंफ्राप्रोजेक्ट्स (GR Infra)महेवा घाट यमुना पुल शामिल, करीब 89% काम पूरा
पैकेज-5रामपुरिया अव्वल से कर्वी, चित्रकूट42.550 किमीEPCमेसर्स केसीसी बिल्डकॉन (KCC Buildcon)फोर-लेन चौड़ीकरण, रम्मपुरिया में 50 मीटर सड़क धंसाव
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शृंगवेरपुर धाम का संवेदनशील हिस्सा पैकेज-3 में आता है, जिसकी जिम्मेदारी PNC Infratech के पास है। यह हिस्सा Hybrid Annuity Model के तहत विकसित किया जा रहा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार संचालन, नियमित रखरखाव और निर्माण संबंधी दोषों को दूर करने की प्राथमिक संविदात्मक जिम्मेदारी निर्धारित निर्माण एजेंसी की है।

सिर्फ बारिश नहीं, भू-तकनीकी कारण भी सवालों में

राम वन गमन मार्ग के इन हिस्सों में सामने आई समस्या को केवल भारी बारिश से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। शृंगवेरपुर और चित्रकूट के प्रभावित क्षेत्र नदी और बाढ़ के मैदानों से जुड़े हैं। ऐसे इलाकों में जमीन की प्रकृति, पानी का रिसाव, तटबंध की मजबूती और सड़क की नींव की तैयारी निर्माण की गुणवत्ता में अहम भूमिका निभाती है।

प्रभावित क्षेत्रों की मूल मिट्टी में silty clay जैसी कछारीय मिट्टी होने के कारण ऊंचे तटबंध बनाते समय हर परत को निर्धारित नमी स्तर यानी Optimum Moisture Content (OMC) के आसपास उचित घनत्व तक compact करना जरूरी होता है। दिए गए तकनीकी विश्लेषण के अनुसार, निर्माण को तय समय से पहले पूरा करने के दबाव में तटबंध की परतों के पर्याप्त compaction और प्राकृतिक settlement के लिए जरूरी समय नहीं मिलने की आशंका है।

बारिश का पानी सतह और किनारों से तटबंध के अंदर पहुंचने पर मिट्टी के भीतर pore water pressure बढ़ सकता है। इससे सबग्रेड की shear strength प्रभावित होती है और सड़क की सतह नीचे बैठ सकती है। इसी तरह नदी क्षेत्र में बने पहुंच मार्गों की जल निकासी व्यवस्था कमजोर होने पर समस्या और गंभीर हो सकती है।

RE Wall की ड्रेनेज व्यवस्था पर भी सवाल

शृंगवेरपुर में Reinforced Earth Wall का झुकना इस मामले का महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू है। ऐसी संरचनाओं के पीछे पानी जमा न हो, इसके लिए उचित granular filter media और subsurface perforated drainage व्यवस्था जरूरी होती है। उपलब्ध विश्लेषण के अनुसार, यदि पानी की निकासी पर्याप्त नहीं हो तो दीवार के पीछे hydrostatic pressure बढ़ सकता है। इससे कंक्रीट फेशिया पैनल और supporting beams पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

शृंगवेरपुर में सड़क धंसने के साथ RE Wall के पैनल और बीम का बाहर की ओर झुकना इसी तरह की जल निकासी और संरचनात्मक स्थिरता की जांच की जरूरत को सामने लाता है। हालांकि किसी अंतिम तकनीकी निष्कर्ष के लिए विस्तृत स्वतंत्र जांच जरूरी होगी।

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दरारों पर पैचवर्क से समस्या नहीं हुई खत्म

प्रभावित हिस्सों में शुरुआती मरम्मत को लेकर भी सवाल उठे हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, गहरी रिक्तियों और पानी के संभावित रास्तों की विस्तृत भू-तकनीकी जांच तथा स्थिरीकरण करने के बजाय कुछ जगहों पर दरारों में बालू, गिट्टी और सीमेंट का घोल डालकर ऊपर से बिटुमिनस डामर की परत चढ़ाई गई।

लेकिन यदि सड़क के नीचे मौजूद voids और water seepage के रास्ते बने रहें तो केवल सतह की मरम्मत लंबे समय तक प्रभावी नहीं हो सकती। यही वजह है कि अगली बारिश के बाद कुछ स्थानों पर पैचवर्क के उखड़ने और दरारों के दोबारा सामने आने की बात कही गई है।

अधिकारी ने भारी बारिश को बताया वजह

घटना सामने आने के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग खंड के अधिशासी अभियंता रवींद्र पाल सिंह ने कहा कि अप्रत्याशित मूसलाधार बारिश के कारण मार्ग का एक सीमित हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ है। उन्होंने बताया कि निर्माण एजेंसी को सड़क को निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुसार जल्द से जल्द दोबारा तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं।

राम पथ से अलग है NH-731A का प्रशासनिक ढांचा

इस मामले में अयोध्या के 13 किलोमीटर लंबे आंतरिक राम पथ और करीब 210 किलोमीटर लंबे अंतर-जनपदीय राम वन गमन मार्ग यानी NH-731A के प्रशासनिक ढांचे में अंतर भी महत्वपूर्ण है। जून 2024 में अयोध्या के राम पथ पर पहली बारिश के बाद सड़क धंसने की घटना में उत्तर प्रदेश सरकार ने PWD और जल निगम के छह अधिशासी और सहायक अभियंताओं को निलंबित किया था।

इसके विपरीत NH-731A के शृंगवेरपुर और चित्रकूट मामलों में उपलब्ध जानकारी के अनुसार निर्माण एजेंसियों को Defect Liability Clause के तहत बिना अतिरिक्त भुगतान के प्रभावित संरचनाओं की मरम्मत करने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं निर्माण के दौरान तैनात गुणवत्ता नियंत्रकों के खिलाफ किसी बड़ी निलंबन कार्रवाई का औपचारिक विवरण सामने नहीं आया है।

राजनीतिक विवाद भी तेज

सड़क धंसने की तस्वीरें और घटनाक्रम सार्वजनिक होने के बाद मामला राजनीतिक विवाद में भी बदल गया। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव समेत विपक्षी नेताओं ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के जरिए सरकार की अवसंरचना नीति और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठाए।

विपक्ष की ओर से आरोप लगाया गया कि करीब ₹4,400 करोड़ की लागत से तैयार हो रहे इस धार्मिक महत्व वाले मार्ग का उद्घाटन से पहले ही धंसना निर्माण गुणवत्ता और ठेकेदारों को लेकर सरकारी निगरानी पर सवाल खड़े करता है। दूसरी ओर स्थानीय नागरिकों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने केवल सतही मरम्मत के बजाय पूरे कॉरिडोर का स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण कराने की मांग उठाई है।

पूरे कॉरिडोर का थर्ड-पार्टी क्वालिटी ऑडिट क्यों जरूरी

इस तरह की घटना केवल एक स्थान की सड़क तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। करीब 210 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर में अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियां और निर्माण पैकेज हैं। इसलिए प्रभावित हिस्सों के साथ दूसरे संवेदनशील हिस्सों की भी स्वतंत्र जांच उपयोगी हो सकती है।

विशेषज्ञ स्तर की जांच में Ground Penetrating Radar (GPR) और Plate Load Test जैसे परीक्षणों के जरिए सड़क और तटबंध के भीतर मौजूद संभावित voids तथा कमजोर हिस्सों की पहचान की जा सकती है। शृंगवेरपुर और रम्मपुरिया जैसे प्रभावित स्थानों पर ऐसी जांच से सड़क की वास्तविक स्थिति का बेहतर आकलन किया जा सकता है।

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इसके साथ गंगा और यमुना के अधिकतम बाढ़ स्तर को ध्यान में रखते हुए पहुंच मार्गों की hydrological re-modelling भी जरूरी मानी जा रही है। RE Wall के पीछे पानी जमा होने से रोकने के लिए उचित geosynthetic और geo-drainage व्यवस्था की भी तकनीकी समीक्षा की जरूरत है।

Independent Engineer और Quality Assurance की जवाबदेही

इस मामले का एक बड़ा सवाल यह भी है कि निर्माण के दौरान quality assurance की जिम्मेदारी निभाने वाले सिस्टम ने इन कमजोरियों को समय रहते क्यों नहीं पकड़ा। लंबे समय तक चलने वाली सार्वजनिक अवसंरचना परियोजनाओं में सिर्फ contractor की भूमिका ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि Independent Engineer और Third-Party Quality Assurance की निगरानी भी अहम होती है।

यदि किसी परियोजना में commercial launch से पहले ही संरचनात्मक समस्या सामने आती है, तो केवल मरम्मत करा देना पर्याप्त जवाबदेही का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। स्वतंत्र तकनीकी जांच के जरिए यह पता लगाना जरूरी होगा कि समस्या डिजाइन, भू-तकनीकी अध्ययन, construction quality, drainage, compaction, traffic loading, maintenance या कई कारणों के संयुक्त प्रभाव से पैदा हुई है।

राम वन गमन मार्ग की आगे की राह

राम वन गमन मार्ग उत्तर प्रदेश की धार्मिक पर्यटन और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी से जुड़ी एक बड़ी परियोजना है। ऐसे में इसके किसी हिस्से में लोकार्पण से पहले सड़क धंसने की घटना परियोजना की दीर्घकालिक गुणवत्ता को लेकर गंभीर संकेत देती है। शृंगवेरपुर में गंगा पुल के पहुंच मार्ग की समस्या और रम्मपुरिया में नई सड़क का धंसना दोनों अलग-अलग परिस्थितियों में सामने आए हैं, लेकिन दोनों मामलों में सड़क की नींव, जल निकासी, मिट्टी की मजबूती और यातायात भार जैसे पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।

आगे की सबसे अहम जरूरत प्रभावित स्थानों पर केवल surface patchwork करने के बजाय पूरी संरचना की वैज्ञानिक जांच और स्थायी समाधान की है। साथ ही पूरे कॉरिडोर का third-party quality audit, भू-तकनीकी परीक्षण और drainage system की समीक्षा यह तय करने में मदद कर सकती है कि समस्या सिर्फ दो स्थानों तक सीमित है या परियोजना के दूसरे संवेदनशील हिस्सों में भी अतिरिक्त सावधानी की जरूरत है।

करीब ₹4,400 करोड़ से ₹4,550 करोड़ की लागत और 210 किलोमीटर के इस बड़े कॉरिडोर में सार्वजनिक धन के साथ-साथ यात्रियों की सुरक्षा भी जुड़ी है। इसलिए अंतिम लोकार्पण से पहले निर्माण गुणवत्ता, संविदात्मक दायित्व और स्वतंत्र तकनीकी निगरानी की भूमिका को स्पष्ट करना परियोजना की विश्वसनीयता के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।