आजमगढ़ और मऊ के 13 युवकों को रूस में नौकरी का झांसा देकर रूसी सेना में भर्ती किए जाने का मामला मानव तस्करी और जबरन सैन्य सेवा की गंभीर तस्वीर सामने लाता है। इनमें 10 की मौत हो चुकी है, एक युवक अभी लापता है और दो घायल हालत में भारत लौट सके।

रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़ा आजमगढ़ और मऊ के 13 युवकों का मामला नौकरी के नाम पर हुए धोखे, मानव तस्करी और परिवारों को मिलने वाली रकम के गलत तरीके से इस्तेमाल का गंभीर मामला बनकर सामने आया है। स्रोत के अनुसार, इन युवकों को सुरक्षा गार्ड, रसोइया और निर्माण सहायक जैसी सामान्य नौकरियों का भरोसा देकर रूस ले जाया गया था। रूस पहुंचने के बाद उनके पासपोर्ट और मोबाइल फोन ले लिए गए और रूसी भाषा में तैयार सैन्य अनुबंधों पर हस्ताक्षर करा दिए गए। इसके बाद उन्हें हथियारों की ट्रेनिंग देकर यूक्रेन सीमा के युद्ध क्षेत्र में भेज दिया गया।
आजमगढ़-मऊ के युवकों को कैसे रूस ले जाया गया
वर्ष 2024 की शुरुआत में आजमगढ़ और मऊ के 13 ग्रामीण युवकों को रूस में करीब ₹2 लाख महीने की नौकरी का ऑफर दिया गया था। उन्हें बताया गया था कि काम सेना से जुड़ा नहीं होगा। इन परिवारों के लिए यह नौकरी आर्थिक परेशानियों से बाहर निकलने और कर्ज चुकाने का मौका लग रही थी।
युवकों को दिल्ली से बेलारूस के रास्ते या सीधे मॉस्को की फ्लाइट से रूस ले जाया गया। लेकिन मॉस्को पहुंचने के बाद हालात बदल गए। स्रोत के अनुसार, भारतीय और रूसी एजेंटों ने उनके पासपोर्ट और मोबाइल फोन अपने पास रख लिए। इसके बाद उनसे रूसी भाषा में लिखे सैन्य अनुबंधों पर हस्ताक्षर कराए गए। युवक इन अनुबंधों की भाषा और पूरी जानकारी से अनजान थे।
इसके बाद उनका शारीरिक परीक्षण हुआ और उन्हें जंगलों में बनी सैन्य छावनियों में भेज दिया गया। वहां उन्हें सिर्फ 15 दिनों में आधुनिक हथियार, रॉकेट और हैंड ग्रेनेड चलाने की ट्रेनिंग दी गई। जब युवकों ने विरोध किया तो उन्हें बताया गया कि यह ट्रेनिंग सिर्फ अपनी सुरक्षा के लिए है। लेकिन ट्रेनिंग खत्म होने के बाद उन्हें तीन-तीन के ग्रुप में बांट दिया गया और यूक्रेन सीमा के सक्रिय युद्ध क्षेत्रों में भेज दिया गया। इनमें लुहांस्क और सुद्झा (Sudzha) के इलाके भी शामिल थे।
13 युवकों में 10 की मौत, एक लापता
स्रोत के अनुसार, आजमगढ़ और मऊ से जुड़े इस 13 युवकों के समूह में 10 की मौत हो चुकी है। एक युवक अभी लापता है और दो घायल होकर भारत लौटे हैं। अलग-अलग मामलों में परिवारों को शव, अवशेष, मृत्यु प्रमाणपत्र या दूसरे दस्तावेज मिले, जबकि कुछ परिवार आज भी पहचान और वापसी को लेकर परेशान हैं।
आजमगढ़ के भोजपुर माधोपट्टी निवासी योगेंद्र यादव तीन बेटियों और एक बेटे के पिता थे। वह पहले खाड़ी देशों में भी काम कर चुके थे। 3 जून 2024 को यूक्रेन के अग्रिम मोर्चे पर हुए एक बड़े विस्फोट में उनकी मौत हो गई। युद्ध क्षेत्र से उनका शव निकालना संभव नहीं हो सका। रूसी रक्षा मंत्रालय ने परिवार को उनकी सैन्य टोपी, रूसी झंडा और मृत्यु प्रमाणपत्र भेजा। शव नहीं मिलने के कारण परिवार ने आजमगढ़ के चंद्रमा ऋषि आश्रम में उनकी सैन्य वर्दी का अंतिम संस्कार किया।
आजमगढ़ के साथियांव निवासी 19 वर्षीय होमेश्वर प्रसाद ने मोर्चे पर भेजे जाने के समय अपने पिता इंदू प्रसाद को एक ऑडियो संदेश भेजा था। उन्होंने बताया था कि वह मोर्चे पर फंस चुके हैं। इसके बाद उनसे संपर्क टूट गया। रूसी सेना ने उन्हें ‘Missing in Action’ यानी युद्ध के दौरान लापता घोषित किया। उनकी पहचान के लिए परिवार के डीएनए नमूने मॉस्को भेजे गए।
दीपक अपनी बहन की शादी के लिए पैसे जुटाने के मकसद से रूस गए थे। उन्होंने युद्ध क्षेत्र से निकलने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो सके। उनके परिवार को अब भी उनके लौटने की उम्मीद थी, हालांकि रूसी रक्षा मंत्रालय भारत सरकार को उनकी मौत की आधिकारिक सूचना दे चुका था।
आजमगढ़ के गुलामी का पूरा निवासी अजहरूद्दीन खान, जिन्हें अजहर भी कहा गया है, के मामले में शव की पहचान को लेकर बड़ा विवाद सामने आया। 12 जून को उनके अवशेष भारत लाए गए, लेकिन उनकी मां नसरीन ने उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया। परिवार का कहना था कि जो कंकाल लाया गया था, उसकी शारीरिक बनावट अजहरूद्दीन से मेल नहीं खाती थी। परिवार ने सही पहचान और मुआवजे के लिए दोबारा कानूनी मदद मांगी।
कन्हैया यादव को रसोइये की नौकरी का झांसा दिया गया था। उनकी भी युद्ध क्षेत्र में मौत हो गई। सुनील यादव और श्याम सुंदर भी अग्रिम मोर्चे पर मारे गए। इन युवकों के पार्थिव शरीर या अवशेष सितंबर से दिसंबर 2024 के बीच भारत लाए गए। अरविंद कुमार, धीरेंद्र कुमार और रामचंद्र भी मोर्चे पर भेजे जाने के बाद गंभीर रूप से प्रभावित हुए और मृतकों के समूह में शामिल रहे।
13 प्रभावित युवकों की स्थिति
| नाम | गृह जनपद | जिस काम का प्रस्ताव मिला | आधिकारिक स्थिति | शव या प्रमाण की स्थिति |
|---|---|---|---|---|
| योगेंद्र यादव | आजमगढ़ | सुरक्षा गार्ड | मृत, 3 जून 2024 को हताहत | शव नहीं मिला; वर्दी, टोपी, झंडा और मृत्यु प्रमाणपत्र मिला |
| कन्हैया यादव | आजमगढ़ | रसोइया / सहायक | मृत, दिसंबर 2024 | पार्थिव शरीर मिला और अंतिम संस्कार हुआ |
| सुनील यादव | मऊ | सुरक्षा गार्ड / सहायक | युद्ध क्षेत्र में मृत | अवशेष भारत लाए गए |
| श्याम सुंदर | मऊ | सुरक्षा गार्ड / सहायक | युद्ध क्षेत्र में मृत | अवशेष भारत लाए गए |
| अजहरूद्दीन खान (अजहर) | आजमगढ़ | सुरक्षा गार्ड | रूसी रिकॉर्ड के अनुसार मृत | 12 जून को कंकाल अवशेष मिले, लेकिन परिवार ने पहचान पर सवाल उठाया |
| दीपक | आजमगढ़/मऊ | सुरक्षा गार्ड | रूसी रक्षा मंत्रालय ने मौत की सूचना दी | शव नहीं मिला |
| होमेश्वर प्रसाद | आजमगढ़ | सुरक्षा गार्ड | लापता | डीएनए प्रोफाइलिंग के लिए रिपोर्ट रूस भेजी गई |
| अरविंद कुमार | आजमगढ़ | सुरक्षा गार्ड / सहायक | मृत समूह में शामिल | मोर्चे पर तैनाती के बाद हताहत |
| धीरेंद्र कुमार | आजमगढ़/मऊ | सुरक्षा गार्ड / सहायक | मृत समूह में शामिल | मोर्चे पर तैनाती के बाद हताहत |
| रामचंद्र | आजमगढ़/मऊ | सुरक्षा गार्ड / सहायक | मृत समूह में शामिल | अग्रिम मोर्चे पर तैनाती के बाद संपर्क टूटा और हताहत हुए |
| विनोद यादव | मऊ | स्थानीय एजेंट / श्रमिक | मृत | खुद भी सिंडिकेट का शिकार होकर युद्ध क्षेत्र में मारे गए |
| राकेश यादव | आजमगढ़ | सुरक्षा गार्ड | घायल, जीवित लौटे | कूटनीतिक हस्तक्षेप के बाद सितंबर 2024 में भारत लौटे |
| ब्रजेश कुमार यादव | मऊ | सुरक्षा गार्ड | घायल, जीवित लौटे | कूटनीतिक हस्तक्षेप के बाद सितंबर 2024 में भारत लौटे |
राकेश और ब्रजेश ने बताई युद्ध क्षेत्र की स्थिति
आजमगढ़ के भीमसेनपुर निवासी राकेश यादव और मऊ के लिल्हावा निवासी ब्रजेश कुमार यादव इस पूरे मामले में घायल होकर भारत लौटने वाले दो युवक हैं। दोनों की उम्र क्रमशः 29 और 30 साल बताई गई है। दोनों पेंटर का काम करते थे।
दोनों 17 जनवरी 2024 को रूस पहुंचे थे। उनके अनुसार, भाषा की परेशानी का फायदा उठाकर उन्हें वहां फंसा लिया गया। शुरुआत में उनसे युद्ध क्षेत्र से पीछे गोला-बारूद की लोडिंग, बंकरों की सफाई और खाना बनाने जैसे काम कराए गए। बाद में उन्हें सीधे अग्रिम मोर्चे पर भेज दिया गया।
ब्रजेश को बेलारूस के रास्ते रूस के नियंत्रण वाले यूक्रेन के शहर लुहांस्क भेजा गया। वहां उन्हें ड्रोन हमलों और भारी तोपखाने की गोलीबारी के बीच 11 दिन तक खाइयों में रहकर लड़ना पड़ा।
राकेश को सुद्झा सेक्टर में भेजा गया था। एक घायल रूसी कमांडर को बचाने के दौरान यूक्रेनी ड्रोन से गिराए गए ग्रेनेड के छर्रों से उनकी कोहनी बुरी तरह घायल हो गई। वह 11 दिन तक एक बंकर में छिपे रहे। इसके बाद उन्हें चेचन-नियंत्रित एक सैन्य अस्पताल में भेजा गया। उनके साथ घायल हुए अरविंद, धीरेंद्र और योगेंद्र जैसे साथियों को चलने-फिरने लायक होने के बाद दोबारा मोर्चे पर भेज दिया गया।
राकेश और ब्रजेश की गंभीर चोटों के कारण उनका दो महीने से ज्यादा समय तक अस्पतालों में इलाज चला। इसी दौरान दोनों किसी तरह एक-दूसरे और भारतीय दूतावास से संपर्क करने में सफल हुए। जुलाई 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मॉस्को यात्रा के बाद बनी कूटनीतिक सहमति के आधार पर भारतीय दूतावास ने दोनों को अपने संरक्षण में लिया। दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद सितंबर 2024 के आखिरी सप्ताह में दोनों भारत लौट आए।
मानव तस्करी नेटवर्क कैसे काम करता था
स्रोत के अनुसार, यह भर्ती नेटवर्क कई स्तरों पर काम करने वाला अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट था। इसमें स्थानीय दलाल, दिल्ली में चल रही फर्जी कंसल्टेंसी फर्म और रूस में मौजूद विदेशी संचालक शामिल थे।
मऊ के विनोद यादव इस नेटवर्क में स्थानीय संपर्क के रूप में काम करते थे। उन्होंने युवकों को नई दिल्ली के भीकाजी कामा प्लेस स्थित एक भर्ती एजेंसी के संचालकों सुमित, दुष्यंत और सुल्तान से मिलवाया। लेकिन रूस पहुंचने के बाद विनोद खुद भी इसी नेटवर्क का शिकार हो गए और उन्हें रूसी सेना में जबरन भर्ती कर दिया गया। बाद में युद्ध क्षेत्र में उनकी मौत हो गई।
स्रोत के अनुसार, युवकों के रूस पहुंचते ही स्थानीय रूसी संचालकों की मदद से उनके खून के नमूने लिए गए और रूसी बैंकों में उनके खाते खोले गए। रूसी सेना की ओर से प्रत्येक भर्ती के नाम पर मिलने वाले ₹7 लाख के अग्रिम बोनस को एजेंटों ने युवकों के डेबिट कार्ड और बैंकिंग जानकारी लेकर अपने कब्जे में कर लिया। परिवारों को सिर्फ ₹50,000 से ₹90,000 तक की रकम भेजी गई।
युद्ध क्षेत्र में घायल होने या मौत होने पर मिलने वाले ₹23 लाख से ₹30 लाख के मुआवजे पर भी एजेंटों के कब्जे का आरोप है। कन्हैया यादव के बेटे अजय यादव ने बताया कि उनके पिता के खाते में रूसी सरकार की ओर से ₹23 लाख की क्षतिपूर्ति राशि भेजी गई थी, लेकिन यह रकम परिवार तक नहीं पहुंची। मामला सामने आने के बाद भीकाजी कामा प्लेस वाला कार्यालय बंद हो गया और मुख्य संचालक फरार हो गए।
सीबीआई ने कई शहरों में की कार्रवाई
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई ने 6 मार्च 2024 को इस भर्ती नेटवर्क के खिलाफ FIR दर्ज की। इसके बाद दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, तिरुवनंतपुरम, अंबाला, चंडीगढ़ और मदुरै में 13 ठिकानों पर छापेमारी की गई। जांच के दौरान ₹50 लाख से ज्यादा नकद, फर्जी अनुबंध पत्र, पासपोर्ट और कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए गए।
सीबीआई ने 17 वीजा कंसल्टेंसी फर्मों और 19 लोगों को मामले में नामजद किया। इनमें नई दिल्ली की ’24×7 आरएएस ओवरसीज फाउंडेशन’, मुंबई की ‘ओएसडी ब्रदर्स ट्रैवल्स एंड वीजा सर्विसेज’, चंडीगढ़ की ‘एडवेंचर वीजा सर्विसेज’ और दुबई/मुंबई से जुड़ा यूट्यूब नेटवर्क ‘बाबा व्लॉग्स’ शामिल था।
मई 2024 तक सीबीआई ने चार प्रमुख आरोपियों को गिरफ्तार किया। इनमें रूसी रक्षा मंत्रालय में संविदा अनुवादक के रूप में काम करने वाले निजिल जोबी बेन्सम भी शामिल थे। स्रोत के अनुसार, उन पर भारतीय नागरिकों को गुमराह करने और उनके सैन्य अनुबंधों के अनुवाद में हेरफेर करने की मुख्य भूमिका थी।
वीजा प्रक्रिया से जुड़े माइकल एंथनी और दक्षिण भारत से युवकों को इस नेटवर्क में लाने वाले दो स्थानीय एजेंट अरुण और येसुदास जूनियर उर्फ प्रियन को भी न्यायिक हिरासत में भेजा गया।
भारत ने रूस के सामने उठाया मामला
भारत के विदेश मंत्रालय ने इस मामले को भारत-रूस संबंधों में गंभीर समस्या के रूप में उठाया। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ हुई बैठकों में इस मुद्दे पर बात की। उन्होंने भारतीय संसद के दोनों सदनों में भी इस मामले की जानकारी दी। भारत का कहना था कि भारतीय नागरिकों से दबाव, धोखे और भाषा की जानकारी न होने की स्थिति में कराए गए सैन्य अनुबंधों को भारत सरकार वैध नहीं मानती।
जुलाई 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मॉस्को यात्रा के दौरान उन्होंने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सामने भारतीय नागरिकों को रूसी सेना से तुरंत मुक्त करने का मुद्दा उठाया। स्रोत के अनुसार, पुतिन ने भारतीय नागरिकों को सैन्य अनुबंध से मुक्त कर सुरक्षित भारत भेजने का सीधा आश्वासन दिया।
अक्टूबर 2024 में कजान में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान भी इस प्रक्रिया की समीक्षा की गई। स्रोत के अनुसार, कूटनीतिक दबाव के बाद रूसी रक्षा मंत्रालय ने अप्रैल 2024 से भारत समेत अन्य मित्र देशों के नागरिकों की रूसी सशस्त्र सेनाओं में किसी भी तरह की नई भर्ती पर पूरी तरह रोक लगाने की घोषणा की।
विदेशी सैनिकों के लिए मुआवजे की व्यवस्था
स्रोत में रूसी सेना के संविदा नियमों के तहत विदेशी सैनिकों के लिए करीब $5,000 का साइनिंग बोनस और $2,500 महीने का वेतन बताया गया है। मौत की स्थिति में परिवार को करीब $1,68,000 यानी लगभग ₹1.4 करोड़ की अनुग्रह राशि और परिवार को रूसी नागरिकता देने का प्रावधान भी बताया गया है।
घायल होने की स्थिति में करीब $30,000 से $35,000 तक की मेडिकल सहायता का भी उल्लेख है। लेकिन स्रोत के अनुसार, एजेंटों के पास बैंक खातों और बैंकिंग जानकारी का नियंत्रण होने के कारण इन पैसों का एक हिस्सा परिवारों तक सीधे नहीं पहुंच सका।
सुप्रीम कोर्ट ने दिए कई निर्देश
इस मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी हस्तक्षेप किया। स्रोत के अनुसार, कोर्ट ने विदेश मंत्रालय को कई सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए। केंद्र सरकार को एक वरिष्ठ नोडल अधिकारी नियुक्त करने को कहा गया, जो पीड़ित परिवारों, मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास और नई दिल्ली स्थित रूसी दूतावास के बीच सीधे संपर्क और समन्वय का काम करे।
युद्ध क्षेत्र से मिले ऐसे अवशेष जिनकी पहचान नहीं हो पाई है, उनकी पहचान के लिए भारत में 21 से ज्यादा परिवारों के डीएनए नमूने लेने और उन्हें रूसी फॉरेंसिक लैब्स में मौजूद नमूनों से मिलाने का निर्देश भी दिया गया।
कोर्ट ने पीड़ित परिवारों को कानूनी सहायता देने और उनके वित्तीय दावों की रकम सीधे उनके वैध भारतीय बैंक खातों में भेजने की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा। साथ ही सभी जरूरी सरकारी पत्राचार और जानकारी परिवारों को हिंदी में उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया।
भारतीय नागरिकों के मामलों के आंकड़े समय के साथ बढ़े
स्रोत में अलग-अलग समय पर सरकारी मंचों पर सामने आए आंकड़ों से पता चलता है कि रूसी सेना में भारतीयों की भर्ती से जुड़े मामलों की संख्या समय के साथ बढ़ी। संसद में अगस्त 2024 के वक्तव्य में 91 मामले दर्ज थे। इनमें 14 लोगों की वापसी और 8 मौतों की पुष्टि हुई थी, जबकि 69 लोग कार्यमुक्ति की प्रक्रिया में बताए गए थे।
जनवरी 2025 की विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग में कुल 126 मामले दर्ज बताए गए। इनमें 96 लोगों की सुरक्षित वापसी, 12 मौतें और रूस की ओर से 16 लोगों को लापता बताया जाना शामिल था। दो लोगों की स्थिति बाकी थी, जिनमें एक इलाज करा रहा था और एक की प्रक्रिया चल रही थी।
सुप्रीम कोर्ट में दिए गए अपडेटेड हलफनामे में कुल दर्ज मामलों की संख्या 217 बताई गई। इनमें 139 लोग कार्यमुक्त होकर लौट चुके थे, 49 मौतों की पुष्टि हुई थी और 29 लोग लापता या अज्ञात स्थिति में थे। करीब दो दर्जन लोगों की सेवा या प्रक्रिया से जुड़ी स्थिति बाकी बताई गई।
| स्रोत / समय | कुल मामले | वापसी / कार्यमुक्त | पुष्ट मौतें | लापता / अज्ञात | बाकी स्थिति |
|---|---|---|---|---|---|
| लोकसभा वक्तव्य, अगस्त 2024 | 91 | 14 | 8 | स्पष्ट नहीं | 69 |
| विदेश मंत्रालय ब्रीफिंग, जनवरी 2025 | 126 | 96 | 12 | 16 | 2 |
| सुप्रीम कोर्ट हलफनामा, अपडेटेड डेटा | 217 | 139 | 49 | 29 | लगभग दो दर्जन |
स्रोत के अनुसार, इन आंकड़ों में बढ़ोतरी की एक वजह यह भी थी कि कई भारतीय नागरिक अनौपचारिक रास्तों से रूस पहुंचे थे। कुछ लोग यूएई या बेलारूस जैसे तीसरे देशों के रास्ते गए, जबकि कुछ पर्यटक या छात्र वीजा पर मॉस्को पहुंचे। इस वजह से शुरुआत में उनके बारे में भारतीय दूतावास के पास पूरी जानकारी नहीं थी। परिवारों ने तलाश शुरू की और युद्ध क्षेत्र से संकट वाले वीडियो संदेश सामने आने के बाद नेटवर्क का बड़ा हिस्सा सामने आया।
विदेश में नौकरी के नाम पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत
आजमगढ़ और मऊ के इन 13 युवकों का मामला दिखाता है कि विदेश में नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को फर्जी एजेंटों और बिना पंजीकरण वाली कंसल्टेंसी से कितना बड़ा खतरा हो सकता है। स्रोत में भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कई सुधारों की जरूरत बताई गई है।
इनमें भारत सरकार के ‘ई-माइग्रेट’ सुरक्षा सिस्टम को गैर-ईसीआर देशों के साथ-साथ पर्यटक और छात्र वीजा पर विदेश जाने वाले संभावित कामगारों के लिए भी जरूरी करने का सुझाव शामिल है। महानगरों में बिना रजिस्ट्रेशन चल रही फर्जी कंसल्टेंसी पर संगठित अपराध से जुड़े कानूनों के तहत कार्रवाई की बात भी कही गई है।
इसके अलावा लापता भारतीयों की पहचान के लिए डीएनए आधारित साफ और पारदर्शी व्यवस्था, युद्ध में मारे गए लोगों के परिवारों को मिलने वाली रकम को दलालों से अलग रखना और रूसी सरकार से मिलने वाला मुआवजा सीधे परिवारों के बैंक खातों में भेजने की व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताई गई है।
Frequently Asked Questions
आजमगढ़ और मऊ के कितने युवकों को रूस ले जाया गया था?
स्रोत के अनुसार, आजमगढ़ और मऊ के 13 युवकों को वर्ष 2024 की शुरुआत में गैर-सैन्य नौकरियों का प्रस्ताव देकर रूस ले जाया गया था।
इन 13 युवकों की क्या स्थिति हुई?
स्रोत के अनुसार, 10 युवकों की मौत हो चुकी है, एक युवक लापता है और दो घायल होकर भारत लौट चुके हैं।
युवकों को रूस में किस नौकरी का वादा किया गया था?
उन्हें सुरक्षा गार्ड, रसोइया, सहायक और दूसरी गैर-सैन्य नौकरियों का प्रस्ताव दिया गया था। उन्हें करीब ₹2 लाख महीने के वेतन का लालच दिया गया था।
सीबीआई ने इस मामले में कब FIR दर्ज की?
सीबीआई ने 6 मार्च 2024 को भर्ती नेटवर्क के खिलाफ FIR दर्ज की थी। इसके बाद सात शहरों में 13 जगहों पर छापेमारी की गई और नकद, फर्जी अनुबंध, पासपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए गए।
आजमगढ़ और मऊ के 13 युवकों की कहानी में नौकरी का झांसा, जबरन सैन्य भर्ती, युद्ध क्षेत्र में मौत, लापता नागरिकों की पहचान, बैंक खातों पर एजेंटों के नियंत्रण और मुआवजे से जुड़े विवाद एक साथ सामने आते हैं। स्रोत के अनुसार, कूटनीतिक बातचीत, सीबीआई जांच और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के जरिए प्रभावित भारतीयों की वापसी, पहचान और परिवारों तक उनके अधिकार पहुंचाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

Praveen Yadav is the Founder and Editor at The Nation Bulletin. With over 3 years of experience in digital journalism and news reporting, he covers national affairs, governance, and breaking current events with a commitment to factual accuracy and verified reporting.


