मध्य प्रदेश के उज्जैन से गरोठ तक बन रहे करीब 136 किलोमीटर लंबे फोरलेन ग्रीनफील्ड हाईवे पर निर्माण की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. करीब 2,600 करोड़ रुपये की इस अहम सड़क परियोजना पर यातायात शुरू होने से पहले ही प्रेमनगर रेलवे ओवरब्रिज (ROB) की एप्रोच रोड दूसरी बार धंस गई. करीब 17 मीटर ऊंचे तटबंध की रिटेनिंग वॉल और सड़क का लगभग 500 मीटर हिस्सा बुरी तरह प्रभावित हुआ है.
मामला सामने आने के बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने अब किसी तरह की मामूली मरम्मत कराने के बजाय प्रभावित हिस्से को जमीन से दोबारा बनाने का फैसला किया है. 21 और 22 अगस्त 2026 को IIT दिल्ली के विशेषज्ञों ने मौके का तकनीकी निरीक्षण किया था. इसके बाद 17 मीटर ऊंचे करीब 500 मीटर हिस्से को पूरी तरह हटाकर नए सिरे से बनाने के निर्देश दिए गए.
सात महीने में दूसरी बार धंसी एप्रोच रोड
प्रेमनगर रेलवे ओवरब्रिज की एप्रोच रोड पर पहली बड़ी समस्या 13 फरवरी 2026 को सामने आई थी. उस समय करीब 200 मीटर सड़क की सतह धंस गई थी और आरई वॉल के कंक्रीट ब्लॉक भी क्षतिग्रस्त हुए थे. NHAI ने इसके बाद निर्माण एजेंसी के भुगतान पर रोक लगाई और प्रभावित हिस्से को दोबारा बनाने के निर्देश दिए.
निर्माण एजेंसी ने करीब चार महीने में मरम्मत का काम पूरा कर जून 2026 में नई दीवार और सड़क तैयार कर दी. लेकिन मानसून आते ही एक बार फिर वही समस्या सामने आ गई.
अगस्त 2026 के अंतिम सप्ताह में भारी बारिश के दौरान आरई वॉल के 200 मिलीमीटर वाले कंक्रीट ब्लॉक अपनी जगह से खिसकने लगे. दीवार के पीछे भरा गया पदार्थ बाहर आने लगा और करीब 500 मीटर हिस्से में सड़क पर दरारें तथा धंसाव दिखाई देने लगा.
| समय | क्या हुआ | कार्रवाई |
|---|---|---|
| 13 फरवरी 2026 | करीब 200 मीटर एप्रोच रोड धंसी, आरई वॉल के ब्लॉक क्षतिग्रस्त | NHAI ने भुगतान रोका और दोबारा निर्माण का आदेश दिया |
| जून 2026 | रिटेनिंग वॉल और सड़क का पुनर्निर्माण पूरा | संरचना को प्रारंभिक रूप से स्थिर माना गया |
| अगस्त 2026 | मानसून में आरई वॉल फिर खिसकी, भराव सामग्री बाहर आने लगी | तकनीकी जांच के लिए विशेषज्ञों को लगाया गया |
| 21-22 अगस्त 2026 | IIT दिल्ली के विशेषज्ञों ने साइट का निरीक्षण किया | 500 मीटर हिस्से को पूरी तरह दोबारा बनाने की सिफारिश |
| 29 अगस्त 2026 से | पुरानी सड़क और दीवार को हटाने का काम शुरू | नए सिरे से पुनर्निर्माण शुरू, लक्ष्य मार्च 2027 |
वीडियो वायरल हुआ तो निर्माण एजेंसी पर भी सवाल
दूसरी बार धंसाव के बाद मौके के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए. इन वीडियो में सड़क के हिस्से और आरई वॉल में हुए बदलाव दिखाई दिए. स्रोत के अनुसार, निर्माण एजेंसी की ओर से इन वीडियो को एआई जनरेटेड बताकर खारिज करने का प्रयास किया गया था.
हालांकि, इसके बाद केंद्रीय स्तर पर तकनीकी जांच कराई गई. IIT दिल्ली के विशेषज्ञों के निरीक्षण में संरचना के महत्वपूर्ण हिस्से में स्थिरता संबंधी खामियां सामने आने की बात कही गई. इसके बाद NHAI ने केवल पैचवर्क या ऊपरी मरम्मत के विकल्प को स्वीकार नहीं किया.
17 मीटर ऊंची दीवार क्यों बनी परेशानी?
इस एप्रोच रोड को रेलवे ओवरब्रिज तक पहुंचाने के लिए सड़क का तटबंध करीब 17 मीटर ऊंचा बनाया गया है. इतनी ऊंचाई पर मिट्टी का दबाव काफी बढ़ जाता है. इसी दबाव को नियंत्रित करने के लिए आरई वॉल यानी Reinforced Earth Retaining Wall का इस्तेमाल किया गया था.
स्रोत में दी गई तकनीकी जांच के अनुसार, इस ऊंचे तटबंध की संरचना में स्टेपिंग, बैकफिल सामग्री और जल निकासी से जुड़े सवाल सामने आए हैं. तकनीकी विश्लेषण में यह भी बताया गया कि ऊंचे तटबंध को बिना पर्याप्त चरणबद्ध व्यवस्था के खड़ा करने से निचले हिस्से पर दबाव बढ़ सकता है.
इसके अलावा, आरई वॉल के पीछे इस्तेमाल किए गए भराव को लेकर भी सवाल उठे हैं. तकनीकी मानकों के अनुसार ऐसे हिस्सों में उपयुक्त दानेदार और जल निकासी में मदद करने वाली सामग्री की जरूरत होती है. स्थानीय तकनीकी जांच में लाल और काली मिट्टी के इस्तेमाल का उल्लेख किया गया है.
बारिश का पानी बना बड़ा खतरा
इस पूरे मामले में जल निकासी सबसे अहम मुद्दों में से एक है. 17 मीटर ऊंचे तटबंध के पीछे अगर बारिश का पानी जमा होता है तो मिट्टी के भीतर नमी और दबाव दोनों बढ़ सकते हैं. स्रोत के अनुसार, मौके पर पर्याप्त फिल्टर मीडिया और प्रभावी वीप-होल व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए.
भारी बारिश के दौरान जब भराव सामग्री पानी से संतृप्त हुई तो उसके व्यवहार में बदलाव आया. इससे तटबंध की स्थिरता प्रभावित हुई और आरई वॉल के ब्लॉक तथा उन्हें सहारा देने वाली व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ा.
पहली मरम्मत के दौरान अगर केवल ऊपर की क्षतिग्रस्त संरचना बदली गई और नीचे की मिट्टी तथा नींव से जुड़ी समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं हुआ, तो मानसून में दोबारा धंसाव की आशंका बनी रह सकती थी. इसी वजह से अब NHAI ने प्रभावित हिस्से को जड़ से हटाकर दोबारा बनाने का फैसला किया है.
NHAI ने 500 मीटर हिस्सा पूरी तरह तोड़ने का फैसला क्यों लिया?
21 और 22 अगस्त को IIT दिल्ली के विशेषज्ञों के निरीक्षण के बाद यह तय किया गया कि केवल कुछ हिस्सों की मरम्मत पर्याप्त नहीं होगी. स्रोत के अनुसार, आरओबी के आसपास करीब 100 से 200 मीटर के कोर हिस्से में गंभीर संरचनात्मक विचलन और स्थिरता संबंधी समस्याएं मिलीं.
इसके बाद NHAI ने देवास रोड ब्रिज से रेलवे क्रॉसिंग तक करीब 500 मीटर लंबे और 17 मीटर ऊंचे हिस्से को जमीन से हटाकर दोबारा बनाने का निर्देश दिया. 29 अगस्त 2026 से भारी मशीनों की मदद से सड़क की खुदाई और आरई पैनलों को हटाने का काम शुरू कर दिया गया.
करीब 10 करोड़ रुपये का खर्च ठेकेदार उठाएगा
इस पुनर्निर्माण पर करीब 10 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है. NHAI के रुख के मुताबिक इस अतिरिक्त खर्च का बोझ सार्वजनिक धन पर नहीं डाला जाएगा. निर्माण एजेंसी और कंसेशनायर को ही इसे वहन करना होगा.
| वित्तीय पहलू | स्थिति |
|---|---|
| अनुमानित पुनर्निर्माण लागत | करीब 10 करोड़ रुपये |
| पुनर्निर्माण का खर्च | कंसेशनायर/ठेकेदार द्वारा वहन |
| सार्वजनिक धन पर अतिरिक्त भार | स्रोत के अनुसार शून्य |
| काम का दायरा | 500 मीटर हिस्से का ध्वस्तीकरण और नया निर्माण |
| संभावित संविदात्मक कार्रवाई | बैंक गारंटी, भुगतान और एन्युइटी से जुड़ी कार्रवाई के प्रावधान |
परियोजना हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल यानी HAM के तहत बनाई जा रही है. ऐसे में निर्माण के दौरान सामने आने वाली संरचनात्मक खामी को लेकर संविदात्मक जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है. NHAI ने निर्माण एजेंसी के बिल और माइलस्टोन भुगतान पर रोक जारी रखने के साथ अनुबंध उल्लंघन से जुड़े नोटिस भी जारी किए हैं.
किस कंपनी के जिम्मे है प्रभावित पैकेज?
उज्जैन-गरोठ ग्रीनफील्ड हाईवे को तीन निर्माण पैकेज में बांटा गया है. प्रेमनगर रेलवे ओवरब्रिज वाला हिस्सा पैकेज-I में आता है. इस पैकेज में चंदेसरी से खेड़ाखजूरिया तक करीब 41 से 42 किलोमीटर का हिस्सा शामिल है.
| परियोजना पैरामीटर | विवरण |
|---|---|
| परियोजना | उज्जैन-गरोठ 4-लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड ग्रीनफील्ड हाईवे |
| राष्ट्रीय राजमार्ग | NH-148NG / NH-752D |
| कुल लंबाई | करीब 135 से 136.1 किलोमीटर |
| कुल लागत | करीब 2,600 से 2,660 करोड़ रुपये |
| निर्माण मॉडल | हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM) |
| प्रभावित पैकेज | पैकेज-I |
| पैकेज-I EPC लागत | करीब 703.16 करोड़ रुपये |
| कंसेशनायर/निर्माण एजेंसी | GHV (India) Private Limited / UGRPPL |
| प्रभावित स्थान | चंदेसरी/प्रेमनगर, देवास रोड ROB एप्रोच |
129 किलोमीटर सड़क तैयार, लेकिन पूरा प्रोजेक्ट अटका
इस परियोजना के दूसरे और तीसरे पैकेज का काम लगभग पूरा होने की स्थिति में बताया गया है. स्रोत के अनुसार करीब 129 किलोमीटर मार्ग तैयार हो चुका है. इसके बावजूद पैकेज-I में आरओबी एप्रोच की समस्या के कारण पूरे कॉरिडोर का औपचारिक लोकार्पण और यातायात संचालन प्रभावित हुआ है.
परियोजना को मूल रूप से जुलाई 2024 तक पूरा किया जाना था. बाद में इसकी समयसीमा बढ़ाकर दिसंबर 2026 की गई. अब 500 मीटर हिस्से के पूर्ण पुनर्निर्माण के कारण यातायात के लिए पूरे मार्ग को खोलने का संशोधित लक्ष्य 31 मार्च 2027 रखा गया है.
उज्जैन और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के लिए क्यों अहम है यह हाईवे?
उज्जैन-गरोठ हाईवे सिर्फ एक सामान्य सड़क परियोजना नहीं है. इसका उद्देश्य उज्जैन, देवास और इंदौर क्षेत्र को गरोठ के पास दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे से जोड़ना है. इससे मालवा क्षेत्र की कनेक्टिविटी को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.
इस मार्ग का महत्व वर्ष 2028 में उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ महाकुंभ के लिहाज से भी काफी बढ़ जाता है. आयोजन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और वाहनों के आने की संभावना को देखते हुए बेहतर सड़क कनेक्टिविटी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
यही वजह है कि NHAI इस बार केवल अस्थायी मरम्मत के बजाय पूरी संरचना को दोबारा तैयार कराने पर जोर दे रहा है. सड़क को दोबारा बनाने के बाद गुणवत्ता परीक्षण और लोड टेस्टिंग की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी.
अब सबसे बड़ा सवाल गुणवत्ता नियंत्रण पर
प्रेमनगर आरओबी एप्रोच की दो बार हुई विफलता ने इस परियोजना की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं. खासकर तब, जब पहली बार धंसाव के बाद सड़क और रिटेनिंग वॉल को दोबारा बनाया जा चुका था.
अब नए निर्माण में सिर्फ सड़क की ऊपरी परत को ठीक करना पर्याप्त नहीं होगा. तटबंध की नींव, भराव सामग्री, हर परत का संघनन, जियो-ग्रिड की एंकरिंग और पानी की निकासी जैसी पूरी व्यवस्था की जांच जरूरी होगी.
स्रोत में यह भी सुझाव दिया गया है कि पुनर्निर्माण के दौरान प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण का स्वतंत्र तृतीय-पक्ष प्रयोगशालाओं से सत्यापन कराया जाए. इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि नई संरचना सिर्फ दिखने में मजबूत न हो, बल्कि भारी बारिश और भारी वाहनों के दबाव को भी सुरक्षित तरीके से झेल सके.
मार्च 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य
फिलहाल मौके पर पुरानी सड़क और आरई वॉल को हटाने का काम चल रहा है. निर्माण एजेंसी को प्रभावित 500 मीटर हिस्से को जमीन से दोबारा तैयार करना होगा. नई भराव सामग्री, बेहतर जल निकासी और संरचनात्मक गुणवत्ता की जांच के बाद ही इस हिस्से को यातायात के लिए सुरक्षित माना जाएगा.
इस पूरी प्रक्रिया के लिए मार्च 2027 की समयसीमा तय की गई है. यदि काम तय गुणवत्ता के साथ पूरा होता है और आवश्यक परीक्षण सफल रहते हैं, तो 31 मार्च 2027 तक उज्जैन-गरोठ ग्रीनफील्ड हाईवे को यातायात के लिए खोलने का लक्ष्य है.
निष्कर्ष
उज्जैन-गरोठ ग्रीनफील्ड हाईवे के प्रेमनगर आरओबी की एप्रोच रोड का बार-बार धंसना सिर्फ एक सड़क की मरम्मत का मामला नहीं है. यह सवाल इस बात पर भी है कि करोड़ों रुपये की हाईवे परियोजना में डिजाइन, भू-तकनीकी जांच, निर्माण सामग्री, जल निकासी और गुणवत्ता नियंत्रण की निगरानी कितनी प्रभावी रही.
NHAI ने अब 500 मीटर हिस्से को पूरी तरह तोड़कर नए सिरे से बनाने का फैसला किया है और करीब 10 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च ठेकेदार पर डाला गया है. लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी. नई संरचना को किस तकनीकी मानक पर बनाया जाता है, उसकी स्वतंत्र जांच कैसे होती है और क्या वह अगले मानसून तथा भारी यातायात का दबाव सुरक्षित रूप से झेल पाती है, यही इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल होगा.
खास तौर पर सिंहस्थ महाकुंभ 2028 को देखते हुए इस हाईवे की सुरक्षा और विश्वसनीयता बेहद महत्वपूर्ण है. इसलिए इस बार जल्दबाजी में सड़क खोलने के बजाय हर तकनीकी चरण का प्रमाणित परीक्षण करना ही इस परियोजना के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होगा.

Praveen Yadav is the Founder and Editor at The Nation Bulletin. With over 3 years of experience in digital journalism and news reporting, he covers national affairs, governance, and breaking current events with a commitment to factual accuracy and verified reporting.



