अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट में पहली महिला ट्रस्टी डॉ. निर्मला यादव

अयोध्या के श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में 2 सितंबर 2026 को हुए प्रशासनिक फेरबदल में डॉ. निर्मला यादव को ट्रस्टी बनाया गया। वह ट्रस्ट की पहली महिला ट्रस्टी हैं। उनके साथ अन्य पदों पर भी बदलाव किए गए और पहली बार पेशेवर प्रशासनिक ढांचे के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी का पद बनाया गया।

अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट की पहली महिला ट्रस्टी डॉ. निर्मला यादव
डॉ. निर्मला यादव को श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की पहली महिला ट्रस्टी बनाया गया।

अयोध्या: श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के शासी निकाय में 2 सितंबर 2026 को हुआ फेरबदल मंदिर प्रशासन के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में सामने आया है। मणिराम दास छावनी, अयोध्या में हुई उच्चस्तरीय बैठक में उत्तर प्रदेश के एटा जिले की मूल निवासी और फिरोजाबाद के शिकोहाबाद की वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ. निर्मला यादव को ट्रस्ट का नया सदस्य मनोनीत किया गया। वर्ष 2020 में गठित 15 सदस्यीय ट्रस्ट के इतिहास में यह पहली बार है जब किसी महिला को ट्रस्टी के रूप में जगह मिली है।

यह बदलाव केवल खाली पदों को भरने तक सीमित नहीं है। इसके साथ ट्रस्ट के शीर्ष प्रबंधन में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। यह पुनर्गठन मंदिर प्रशासन में सामाजिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने, पेशेवर प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करने और हाल के विवादों के बाद संस्थागत भरोसा मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

डॉ. निर्मला यादव बनीं ट्रस्ट की पहली महिला ट्रस्टी

डॉ. निर्मला यादव 66 वर्ष की हैं और लंबे समय तक उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काम कर चुकी हैं। वह महाविद्यालय की प्राचार्या रह चुकी हैं और शिक्षक संगठनों में भी लंबे समय तक सक्रिय रही हैं। उनके चयन के साथ श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में पहली बार किसी महिला को निर्णय लेने वाले शीर्ष स्तर पर औपचारिक प्रतिनिधित्व मिला है।

उनकी पृष्ठभूमि में शिक्षा, महाविद्यालय प्रशासन, विश्वविद्यालय की कार्य परिषद, शिक्षक संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी सांगठनिक गतिविधियां शामिल रही हैं। इसी वजह से उनका चयन शैक्षणिक अनुभव, प्रशासनिक क्षमता और सांगठनिक अनुभव के मेल के रूप में देखा जा रहा है।

ट्रस्ट में तीन रिक्तियों और प्रशासनिक बदलाव की पृष्ठभूमि

ट्रस्ट में यह पुनर्गठन तीन प्रमुख रिक्तियों और हाल के प्रशासनिक विवादों की पृष्ठभूमि में हुआ। अयोध्या राजपरिवार के प्रतिनिधि और ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में शामिल विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के निधन के बाद एक पद खाली था। इसके अलावा मंदिर परिसर में चढ़ावे और दान संग्रह से जुड़ी कथित विसंगतियों के विवाद के बाद तत्कालीन महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र के त्यागपत्र से भी शीर्ष प्रबंधन में खालीपन पैदा हुआ।

अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास की अध्यक्षता में हुई बैठक में तीन नए ट्रस्टियों की नियुक्ति को मंजूरी दी गई। इसके साथ ट्रस्ट के दैनिक कामकाज, सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और आधारभूत ढांचे से जुड़े कार्यों को पेशेवर तरीके से संभालने के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी का नया पद भी बनाया गया।

पदपहले की स्थितिनया पदाधिकारीपृष्ठभूमि
पहली महिला ट्रस्टीनया समावेशनडॉ. निर्मला यादववरिष्ठ शिक्षाविद, पूर्व डिग्री कॉलेज प्राचार्या, शिक्षक नेता और आरएसएस से जुड़ी सांगठनिक गतिविधियों में सक्रिय
ट्रस्टीडॉ. अनिल मिश्र के त्यागपत्र के बाद पद खालीमदन मोहन पांडेयवरिष्ठ अधिवक्ता, उत्तर प्रदेश के पूर्व अपर महाधिवक्ता और रामलला के विधिक पैरोकार
कोषाध्यक्ष एवं ट्रस्टीस्वामी गोविंद देव गिरि कोषाध्यक्ष थेमहेश भागचंदकाउद्योगपति, एम2के ग्रुप से जुड़े और अशोक सिंघल फाउंडेशन के प्रमुख
महासचिवचंपत राय के त्यागपत्र के बाद पद में बदलावस्वामी गोविंद देव गिरिआध्यात्मिक चिंतक, वेदाचार्य और ट्रस्ट के संस्थापक कोषाध्यक्ष
मुख्य कार्यकारी अधिकारीनया पदएयर मार्शल (सेवानिवृत्त) जितेंद्र मिश्रापूर्व वेस्टर्न एयर कमांडर, सैन्य रणनीतिकार और फाइटर पायलट
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पहली बार पेशेवर प्रशासनिक ढांचे पर जोर

ट्रस्ट के पुनर्गठन में पेशेवर प्रशासन पर खास जोर दिखाई देता है। वित्तीय अनुशासन, श्रद्धालुओं की भीड़ का प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था और मंदिर से जुड़ी आधारभूत सुविधाओं के आधुनिकीकरण के लिए सीईओ का पद बनाया गया। 5,585 आवेदनों की जांच के बाद भारतीय वायुसेना के सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को तीन साल के कार्यकाल के लिए ट्रस्ट का पहला सीईओ नियुक्त किया गया है।

दूसरी ओर, डॉ. निर्मला यादव का चयन लंबे शैक्षणिक और प्रशासनिक अनुभव को ट्रस्ट के कामकाज में शामिल करने के नजरिए से महत्वपूर्ण है। उनकी सार्वजनिक भूमिका को विवादों से दूर रहने और प्रशासनिक अनुभव के साथ जोड़ा गया है।

एटा से शिकोहाबाद तक डॉ. निर्मला यादव की पारिवारिक पृष्ठभूमि

डॉ. निर्मला यादव का पैतृक संबंध एटा जिले से है। उनका मूल पैतृक निवास एटा में आगरा रोड पर स्थित है, जहां उनका शुरुआती जीवन और शिक्षा से जुड़े संस्कार बने। उनका विवाह फिरोजाबाद जिले के शिकोहाबाद के प्रतिष्ठित उरावर जमींदार परिवार में हुआ। इस परिवार का स्थानीय स्तर पर उरावर हाउस के नाम से उल्लेख किया जाता है।

उनके पति स्वर्गीय हरेंद्र सिंह यादव भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे और क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय तथा सम्मानित व्यक्ति के रूप में जाने जाते रहे। उनकी एकमात्र बेटी श्वेता यादव राजस्थान के जोधपुर में विवाहित हैं। उनके पति सीमा सुरक्षा बल में डिप्टी कमांडेंट के रूप में राष्ट्रसेवा में कार्यरत हैं।

शिक्षा और करीब तीन दशक का प्रशासनिक अनुभव

डॉ. निर्मला यादव ने हिंदी और संस्कृत साहित्य में दो अलग-अलग स्नातकोत्तर उपाधियां यानी एमए की डिग्रियां हासिल कीं। इसके बाद उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उच्च शिक्षण संस्थानों में उनका सेवाकाल करीब तीन दशक का रहा। इनमें लगभग 25 वर्ष उन्होंने महाविद्यालयों के प्रमुख के रूप में बिताए।

13 अगस्त 1999 से जनवरी 2006 तक उन्होंने शिकोहाबाद स्थित बीडीएम डिग्री कॉलेज की प्राचार्या के रूप में काम किया। जुलाई 2006 में उन्होंने फिरोजाबाद के महात्मा गांधी बालिका स्नातकोत्तर महाविद्यालय की प्राचार्या का पद संभाला। इसी पद से वह वर्ष 2021-2022 में सेवानिवृत्त हुईं।

उनके प्रशासनिक कार्यकाल में महाविद्यालय में नई परिसंपत्तियों का निर्माण, परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन जैसे क्षेत्रों पर काम किया गया। इसके अलावा उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा की कार्य परिषद में करीब 15 वर्ष तक सदस्य के रूप में सेवाएं दीं। इस अवधि में दो वर्ष तक वह उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं कुलाधिपति द्वारा नामित विशिष्ट सदस्य भी रहीं।

आरएसएस और राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़ाव

डॉ. निर्मला यादव का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़ी वैचारिक गतिविधियों से संबंध लंबे समय का बताया गया है। उनके परिवार के अनुसार, शिकोहाबाद स्थित उरावर हाउस 1970 के दशक से जनसंघ और आरएसएस के प्रचारकों, विचारकों तथा वरिष्ठ नेताओं की बैठकों, वैचारिक कार्यक्रमों और प्रवास का स्थान रहा है।

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पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, डॉ. यादव छात्र जीवन में वर्ष 1974 से अनौपचारिक रूप से और वर्ष 1984 से औपचारिक रूप से संघ की राष्ट्र-निर्माण गतिविधियों तथा महिला संगठन से जुड़ी रहीं।

1980 के दशक के अंतिम वर्षों और 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान उनके ससुर, पति और वह स्वयं आंदोलन से जुड़ी रहीं। कारसेवा के समय पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारियों के दौर में उनके पारिवारिक आवास पर कार्यकर्ताओं और कारसेवकों को आश्रय और सहायता मिलने की बात कही गई है।

बाद में विश्व हिंदू परिषद की ओर से मंदिर निर्माण के लिए चलाए गए निधि समर्पण अभियान में भी उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शिक्षित वर्ग, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों को जोड़ने में भूमिका निभाई।

ट्रस्टी चुने जाने के बाद डॉ. निर्मला यादव ने इस जिम्मेदारी को “प्रभु श्रीराम का सच्चा प्रसाद” बताया। उन्होंने त्रेता युग में लंका अभियान से पहले श्रीराम द्वारा आद्याशक्ति की आराधना का उदाहरण देते हुए कहा कि भव्य मंदिर के पुनर्निर्माण और संचालन में महिलाओं की निर्णयकारी भागीदारी सनातन परंपरा के संतुलन को दर्शाती है।

शिक्षक संगठन में भी निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

शैक्षणिक प्रशासन के साथ डॉ. निर्मला यादव शिक्षक संगठनों में भी लंबे समय तक सक्रिय रहीं। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ की प्राथमिक और उच्च शिक्षा से जुड़ी केंद्रीय संरचना में दशकों तक काम करती रहीं।

कालखंडदायित्वसंगठन और क्षेत्रमुख्य भूमिका
2019-2022प्रदेश अध्यक्षराष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, उत्तर प्रदेशप्रदेश में उच्च और माध्यमिक संवर्ग के विस्तार तथा शिक्षक सेवा सुरक्षा से जुड़े कानूनी पक्ष को आगे बढ़ाना
समानांतर कार्यकालप्रदेश उपाध्यक्षराष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ, उत्तर प्रदेशप्राथमिक और उच्च शिक्षा संवर्ग के बीच समन्वय तथा नीतिगत प्रतिवेदनों की तैयारी
वर्तमानराष्ट्रीय सह-संपर्क प्रमुख / राष्ट्रीय उपाध्यक्षअखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा से जुड़े विमर्श, भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध से जुड़ी पहलों का समन्वय
दीर्घकालिककार्य परिषद सदस्यडॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय, आगराविश्वविद्यालय की स्वायत्तता, पाठ्यक्रम सुधार और शिक्षक कल्याण से जुड़ी योजनाओं में भागीदारी

प्रदेश नेतृत्व के दौरान उनकी कार्यशैली को आंदोलनकारी टकराव की जगह अकादमिक तर्क और संस्थागत बातचीत पर आधारित बताया गया। उन्होंने उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त और राजकीय महाविद्यालयों के शिक्षकों से जुड़े सेवा अधिकारों, पदोन्नति नियमों और पुरानी पेंशन बहाली जैसे मुद्दों को शासन के सामने उठाया। लंबे सांगठनिक अनुभव के कारण उन्हें संघ परिवार के भीतर एक भरोसेमंद और संकट के समय काम आने वाली संगठनकर्ता के रूप में देखा गया है।

ट्रस्ट के लिए नियुक्ति का वित्तीय और संस्थागत महत्व

डॉ. निर्मला यादव की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब ट्रस्ट से जुड़े चढ़ावे और दान संग्रह में कथित चोरी तथा लेखांकन से जुड़े विवाद सामने आए थे। ऐसे माहौल में लंबे समय तक उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रशासन और बजट से जुड़े काम संभाल चुकी शिक्षाविद का ट्रस्ट के शासी निकाय में आना वित्तीय पारदर्शिता और सार्वजनिक भरोसे के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

डॉ. यादव ने भी अपने प्रशासनिक अनुभव के आधार पर मंदिर प्रबंधन और वित्तीय व्यवस्था में निष्पक्षता तथा पारदर्शिता पर जोर देने की बात कही है। हालांकि, किसी व्यक्ति की नियुक्ति से वित्तीय व्यवस्था में सुधार स्वतः सिद्ध नहीं होता; इसका वास्तविक आकलन आगे के प्रशासनिक फैसलों और व्यवस्था में होने वाले बदलावों से होगा।

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ट्रस्ट में महिला प्रतिनिधित्व का नया अध्याय

वर्ष 2020 में उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद गठित मूल 15 सदस्यीय ट्रस्ट में संतों, राजपरिवार से जुड़े प्रतिनिधियों, प्रशासनिक और विधिक क्षेत्र के लोगों को जगह मिली थी, लेकिन किसी महिला को औपचारिक ट्रस्टी के रूप में शामिल नहीं किया गया था।

डॉ. निर्मला यादव की नियुक्ति के साथ यह स्थिति बदल गई है। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होने के बावजूद निर्णय लेने वाले शीर्ष स्तर पर उनकी अनुपस्थिति को लेकर जो सवाल उठते रहे, इस नियुक्ति से उस प्रतिनिधित्व की कमी दूर हुई है। सीता रसोई और मातृत्व से जुड़े सांस्कृतिक प्रतीकों वाले मंदिर प्रशासन में महिला की भागीदारी को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

यादव समुदाय से आने वाली महिला को प्रतिनिधित्व का सामाजिक संदेश

डॉ. निर्मला यादव की सामाजिक पृष्ठभूमि भी इस नियुक्ति को अलग महत्व देती है। एटा और शिकोहाबाद क्षेत्र उत्तर प्रदेश की राजनीति में यादव समुदाय की मजबूत सामाजिक उपस्थिति वाले क्षेत्रों के रूप में देखे जाते हैं। राज्य की राजनीति में यादव समुदाय को लंबे समय से समाजवादी पार्टी के प्रमुख सामाजिक आधार के रूप में देखा जाता रहा है।

ऐसे सामाजिक क्षेत्र से आने वाली एक उच्च शिक्षित महिला, जिसका संघ परिवार से लंबे समय का जुड़ाव रहा है, को राष्ट्रीय महत्व के धार्मिक न्यास में स्थान मिलना सामाजिक प्रतिनिधित्व और समावेशिता के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसे संघ परिवार की सामाजिक समरसता और पिछड़े वर्गों तथा महिलाओं को नेतृत्व में भागीदारी देने की दीर्घकालिक सोच से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

नए सीईओ और नए ट्रस्टी के साथ आगे की चुनौती

ट्रस्ट के पुनर्गठन में एक तरफ डॉ. निर्मला यादव जैसी अनुभवी शिक्षाविद और दूसरी तरफ सेवानिवृत्त एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा जैसे पेशेवर प्रशासक को जिम्मेदारी दी गई है। सीईओ की नियुक्ति से सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, आधारभूत ढांचे और दैनिक प्रशासन को पेशेवर तरीके से चलाने की उम्मीद है, जबकि डॉ. यादव का शैक्षणिक और प्रशासनिक अनुभव संस्थागत व्यवस्था, वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता से जुड़े विमर्श में उपयोगी हो सकता है।

एटा की पैतृक पृष्ठभूमि से शुरू होकर शिकोहाबाद के शैक्षणिक संस्थानों, विश्वविद्यालय की कार्य परिषद, शिक्षक संगठनों और राम जन्मभूमि से जुड़े सामाजिक-सांगठनिक कार्यों तक पहुंची डॉ. निर्मला यादव की यात्रा अब अयोध्या के श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट तक पहुंची है। उनकी नियुक्ति और नए प्रशासनिक ढांचे की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि आने वाले समय में मंदिर प्रशासन पारदर्शिता, सुरक्षा, श्रद्धालु प्रबंधन, वित्तीय अनुशासन और संस्थागत संतुलन को कितनी प्रभावी तरह से लागू कर पाता है।