मुत्तलिव गुमशुदगी मामला: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने CBI को सौंपी जांच, पुलिस रिकॉर्ड पर सवाल

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मुजफ्फरनगर के मुत्तलिव गुमशुदगी मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है। अदालत ने स्थानीय पुलिस की जांच, केस डायरी और थाने के रिकॉर्ड में सामने आई विसंगतियों पर गंभीर सवाल उठाते हुए तीन सप्ताह में प्रारंभिक रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है।

मुत्तलिव गुमशुदगी मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा CBI जांच के आदेश की प्रतीकात्मक तस्वीर
मुत्तलिव गुमशुदगी मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्थानीय पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए CBI जांच के निर्देश दिए।

प्रयागराज — मुजफ्फरनगर के हिस्ट्रीशीटर मुत्तलिव (मुतलिब) के जेल से रिहा होने के बाद संदिग्ध परिस्थितियों में लापता होने के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। करीब चार महीने से मुत्तलिव का कोई सुराग नहीं मिलने और स्थानीय पुलिस की जांच में विरोधाभास सामने आने के बाद अदालत ने मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी है। अदालत ने पुलिस की केस डायरी, जनरल डायरी और वारंट से जुड़े रिकॉर्ड में मिली विसंगतियों को भी गंभीरता से लिया।

खास बातें

  • मुत्तलिव को 4 मई 2026 को जिला कारागार से रिहा किया गया था, जिसके बाद वह संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गया।
  • उसके भाई आलम ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका के जरिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
  • अदालत ने स्थानीय पुलिस की जांच में वारंट की तारीख, जनरल डायरी और तलाश अभियान से जुड़ी गंभीर विसंगतियां दर्ज कीं।
  • उच्च न्यायालय ने जांच CBI को सौंपते हुए तीन सप्ताह में प्रारंभिक रिपोर्ट मांगी है।
  • मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

मुत्तलिव की रिहाई के बाद क्या हुआ?

मुत्तलिव मुजफ्फरनगर के अलग-अलग थानों में हत्या के प्रयास, लूट, डकैती और शस्त्र अधिनियम जैसे मामलों में आरोपी रहा है। स्रोत के अनुसार उसके खिलाफ करीब 30 आपराधिक मुकदमे दर्ज बताए गए हैं और वह लंबे समय तक न्यायिक अभिरक्षा में रहा।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 17 दिसंबर 2025 को उसकी नियमित जमानत याचिका स्वीकार की थी। जमानत बंधपत्रों और अन्य औपचारिकताओं के बाद उसे 4 मई 2026 को जिला कारागार से रिहा किया गया। इसके बाद उसके लापता होने को लेकर विवाद शुरू हुआ।

मुत्तलिव के भाई आलम की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में आरोप लगाया गया कि जेल से बाहर निकलने के बाद पुरकाजी (पुरकाजीपुर) थाने की पुलिस ने मुत्तलिव और उसके पिता को हिरासत में लिया था। याचिका के अनुसार, पिता को तीन दिन बाद 7 मई 2026 को छोड़ दिया गया, लेकिन मुत्तलिव के बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई।

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उच्च न्यायालय ने पुलिस की जांच पर क्यों उठाए सवाल?

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने की। पीठ ने राज्य सरकार और मुजफ्फरनगर पुलिस की ओर से पेश रिकॉर्ड तथा केस डायरी की जांच की। सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से मुत्तलिव के खुद फरार होने का पक्ष रखा गया, लेकिन अदालत को जांच रिकॉर्ड में कई महत्वपूर्ण सवाल दिखाई दिए।

जांच का पहलूपुलिस का पक्षअदालत के सामने सामने आई विसंगति
गैर-जमानती वारंट (NBW)पुलिस ने कहा कि सत्र परीक्षण संख्या 1344/2012 में NBW जारी था और मुत्तलिव की तलाश की जा रही थी।वारंट की तारीख को लेकर विरोधाभास सामने आया। पुलिस ने 13 मई 2026 की तारीख बताई, जबकि रिकॉर्ड में 18 जून 2026 दर्ज था।
जनरल डायरी (GD)पुलिस ने रिकॉर्ड में प्रविष्टि काटे जाने और नया विवरण दर्ज किए जाने की बात स्वीकार की।एसएचओ ने इसे कांस्टेबल की लापरवाही बताया, लेकिन संबंधित आरक्षी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई थी।
SIT की कार्रवाईपुलिस के अनुसार 15 अगस्त 2026 को विशेष टीम गठित कर मुत्तलिव की तलाश शुरू की गई।अदालत ने पाया कि टीम की कार्रवाई मुख्य रूप से बस स्टैंड और सरकारी कार्यालयों में फोटो लगाने तक सीमित रही; परिजनों, पड़ोसियों और मित्रों के बयान दर्ज नहीं किए गए।
रिहाई के बाद की स्थितिपुलिस का तर्क था कि मुत्तलिव जेल से छूटने के बाद खुद फरार हो गया।केस डायरी में 4 मई 2026 के बाद मुत्तलिव को देखे जाने का कोई गवाह या स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिला।
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थाने के रिकॉर्ड में बदलाव पर भी अदालत सख्त

सुनवाई के दौरान पुरकाजीपुर थाने के प्रभारी निरीक्षक डॉ. मानवेंद्र सिंह भाटी अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए और हलफनामा दाखिल किया। पुलिस रिकॉर्ड की जांच में जनरल डायरी की प्रविष्टि में काट-छांट और नए विवरण दर्ज किए जाने का मामला सामने आया।

पुलिस की ओर से इस बदलाव को कांस्टेबल की लापरवाही बताया गया, लेकिन अदालत ने इस बात पर सवाल उठाया कि इतनी गंभीर रिकॉर्ड संबंधी गड़बड़ी के बावजूद संबंधित पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई। विशेष टीम की कार्रवाई को लेकर भी अदालत ने पुलिस की जांच की गंभीरता पर सवाल उठाए।

मुत्तलिव के मामले में दो संभावनाओं पर अदालत की टिप्पणी

अदालत ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए दो संभावित स्थितियों की ओर संकेत किया। एक संभावना यह थी कि उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि के कारण पुलिस ने उसे गैर-कानूनी तरीके से नुकसान पहुंचाया हो और इसके बाद साक्ष्यों को छिपाने का प्रयास किया गया हो। दूसरी संभावना यह थी कि वह लंबित मुकदमों और संभावित कानूनी परिणामों से बचने के लिए पुलिस की लापरवाही या कथित मिलीभगत के चलते कहीं छिप गया हो।

पीठ ने माना कि दोनों में से वास्तविक स्थिति का सामने आना जरूरी है। यदि पुलिस द्वारा गैर-कानूनी कार्रवाई की आशंका सही साबित होती है तो यह जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन होगा। वहीं यदि मुत्तलिव स्वयं फरार हुआ है, तो उसकी तलाश में पुलिस की कार्यप्रणाली और संभावित लापरवाही की जांच जरूरी होगी।

स्थानीय पुलिस से CBI को सौंपी गई जांच

स्थानीय पुलिस की जांच पर भरोसा नहीं रहने की स्थिति में उच्च न्यायालय ने मामले की जांच CBI को सौंप दी। अदालत ने केंद्रीय एजेंसी को पुरकाजीपुर थाने से संबंधित केस डायरी, जनरल डायरी, वारंट रजिस्टर और अन्य जरूरी दस्तावेज अपने कब्जे में लेने का निर्देश दिया है।

CBI को तीन सप्ताह के भीतर उच्च न्यायालय के सामने प्रारंभिक जांच रिपोर्ट पेश करनी होगी। अदालत ने विशेष रूप से यह पता लगाने को कहा है कि मुत्तलिव जीवित है या उसकी पुलिस अभिरक्षा में हत्या किए जाने की आशंका में कोई तथ्य सामने आता है।

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पुलिस नेतृत्व और निगरानी तंत्र पर भी सवाल

मामले में मुजफ्फरनगर पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे हैं। लंबे समय तक मुत्तलिव के बारे में स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आने, रिकॉर्ड में बदलाव और तलाश अभियान की सीमित कार्रवाई ने पुलिस के पर्यवेक्षण तंत्र की प्रभावशीलता पर प्रश्न खड़े किए हैं।

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि किसी व्यक्ति की आपराधिक पृष्ठभूमि अपने आप उसके संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं करती। यदि पुलिस को किसी अन्य मामले में उसकी तलाश थी, तो उसके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया के तहत गिरफ्तारी और न्यायिक पेशी की कार्रवाई रिकॉर्ड पर होनी चाहिए थी। इसी बिंदु पर अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और पुलिस के दावों की गंभीरता से समीक्षा की।

28 सितंबर को फिर होगी सुनवाई

उच्च न्यायालय ने आदेश की प्रति मुजफ्फरनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भेजने का निर्देश दिया है। साथ ही राज्य पुलिस और जिला प्रशासन को CBI की जांच में आवश्यक दस्तावेज और अन्य सहयोग उपलब्ध कराने को कहा गया है।

मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर 2026 को होगी। उस समय CBI की प्रारंभिक रिपोर्ट के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई पर विचार करेगी। फिलहाल इस मामले में मुत्तलिव के साथ वास्तव में क्या हुआ, इसका अंतिम निष्कर्ष CBI की जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा।