आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द, हाई कोर्ट ने दिए ₹5 लाख मुआवजे के आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नोएडा श्रमिक प्रदर्शन मामले में आकृति चौधरी पर लगा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) का हिरासत आदेश रद्द कर दिया है। अदालत ने करीब पांच महीने की हिरासत को गैरकानूनी माना और ₹5 लाख मुआवजे का आदेश दिया।

प्रयागराज — इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक्टिविस्ट और दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य प्रशासन की कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि हिरासत को सही ठहराने के लिए पेश की गई सामग्री एक “गढ़ी हुई कहानी” पर आधारित थी।

मुख्य बातें

  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी का NSA हिरासत आदेश रद्द किया।
  • अदालत ने गिरफ्तारी और BNSS नोटिस के क्रम में गंभीर गड़बड़ी पाई।
  • राज्य सरकार हिंसा भड़काने से जुड़ा मांगा गया वीडियो सबूत पेश नहीं कर सकी।
  • करीब पांच महीने की हिरासत के लिए ₹5 लाख मुआवजे का आदेश दिया गया।
  • अदालत ने कहा कि अन्य मामलों में वांछित नहीं होने पर आकृति को तत्काल रिहा किया जाए।

आकृति चौधरी का NSA हिरासत आदेश रद्द

आकृति चौधरी ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान उनके वकीलों ने कहा कि वह श्रमिकों की मांगों के समर्थन में प्रदर्शन में गई थीं और न तो मुख्य आयोजक थीं और न ही हिंसा में शामिल थीं।

आकृति की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्वेस के साथ अधिवक्ता चार्ली प्रकाश और माणिक गुप्ता ने पक्ष रखा। अदालत ने राज्य प्रशासन की ओर से हिरासत के लिए दिए गए आधारों की जांच की।

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गिरफ्तारी और नोटिस के क्रम पर अदालत ने उठाए सवाल

अदालत ने पुलिस रिकॉर्ड और जनरल डायरी (GD) प्रविष्टियों की जांच की। राज्य सरकार ने बताया था कि आकृति को 12 अप्रैल की सुबह 10:56 बजे गिरफ्तार किया गया और BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस दिया गया।

पीठ ने पूछा कि क्या BNSS की धारा 126 की जरूरी प्रक्रिया पहले पूरी की गई थी। सरकार ने माना कि धारा 126 के तहत नोटिस नहीं दिया गया था। इसके बाद GD रिकॉर्ड देखने पर अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी पहले हो चुकी थी और नोटिस बाद में तैयार किया गया था।

“रिकॉर्ड से साफ है कि पहले उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उसके बाद नोटिस तैयार किया गया।”

हिंसा भड़काने के आरोप पर नहीं मिला वीडियो सबूत

पुलिस का आरोप था कि 13 अप्रैल को चल रहे श्रमिक आंदोलन के दौरान आकृति ने लोगों को पत्थरबाजी और आगजनी के लिए उकसाया। अदालत ने इस आरोप के समय-क्रम पर भी सवाल उठाया, क्योंकि पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार आकृति उससे पहले ही हिरासत में थीं।

राज्य प्रशासन ने हिंसा में उनकी भूमिका के समर्थन में वीडियो और इलेक्ट्रॉनिक सबूत होने की बात कही थी। अदालत ने ऐसा वीडियो फुटेज पेश करने को कहा जिसमें आकृति लोगों को पत्थर फेंकने या वाहनों में आग लगाने के लिए उकसाती दिख रही हों। राज्य ने इसके लिए अतिरिक्त समय मांगा, लेकिन अदालत ने समय देने से इनकार कर दिया।

“वह पहले ही 5 महीने जेल में बिता चुकी हैं, अब और समय नहीं दिया जाएगा।”

DM के वेतन से ₹5 लाख मुआवजे का आदेश

अदालत ने करीब पांच महीने की गैरकानूनी हिरासत के लिए आकृति चौधरी को ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि गौतमबुद्ध नगर की जिलाधिकारी (DM) मेधा रूपम के वेतन से काटी जाए।

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आदेश में अवैध हिरासत की प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों की जवाबदेही तय करने का निर्देश भी दिया गया।

नोएडा श्रमिक आंदोलन से कैसे जुड़ा मामला

अप्रैल 2026 में नोएडा-ग्रेटर नोएडा औद्योगिक क्षेत्र में 40,000 से अधिक फैक्ट्री श्रमिकों ने न्यूनतम वेतन में संशोधन और बेहतर कार्यस्थल की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू किया था। 13 अप्रैल को आंदोलन उग्र हो गया और इसके बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं।

13 मई को आकृति चौधरी और लखनऊ के पूर्व पत्रकार सत्यम वर्मा पर NSA लगाया गया था। आकृति के बारे में दिए गए विवरण के अनुसार वह पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की निवासी हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज से इतिहास में स्नातक करने के बाद LLB की पढ़ाई कर रही हैं।

अभी पूरी तरह रिहाई क्यों नहीं हो पाएगी?

हाई कोर्ट ने कहा कि अगर आकृति किसी दूसरे मामले में वांछित नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए। हालांकि, प्रदर्शन से जुड़े मामलों में उनके खिलाफ कुल 11 FIR दर्ज हैं। इनमें 5 मामलों में उन्हें पहले ही जमानत मिल चुकी है।

बाकी 6 मामलों में निचली अदालत ने जमानत खारिज कर दी थी। इन मामलों में उनकी अपील हाई कोर्ट में लंबित है। इसलिए इन मामलों में जमानत मिलने तक उनकी पूरी रिहाई नहीं हो सकेगी।